पृथ्वी पर लोगप्रिय कविताएँ | Poem on Earth in Hindi

Poem on Earth in Hindi

पृथ्वी यानी धरती जिसे हम भारतवासी मां के नाम से संबोधित करते हैं,  वह इसलिए कि पृथ्वी मनुष्य के जीवन यापन करने के लिए विशेष प्रकार के संसाधन उपलब्ध कराती हैं ताकि मनुष्य के जीवन पृथ्वी पर समय के अनुसार चलता रहे.

 लेकिन मनुष्य की वजह से ही आज पृथ्वी दिन प्रतिदिन प्रदूषित होती जा रही है जिसका कारण संसाधन का गलत उपयोग, वृक्ष की कटाई, जल प्रदूषण इत्यादि शामिल है.  सरकार पृथ्वी को स्वच्छ करने के लिए तरह-तरह की योजनाएं चला रहे हैं ताकि हमारी माता यानी पृथ्वी पुनः स्वच्छ हो सके.

संपूर्ण ब्रह्मांड में पृथ्वी ही एकमात्र  ऐसी ग्रह है जहां मनुष्य जीवन संभव है, इस ग्रह पर पर्याप्त मात्रा में जल, वायु, वन, अनाज, फल, फूल इत्यादि का मिश्रण उपलब्ध है जो पृथ्वी पर जीवन का सार है. 

समाज को पृथ्वी का संरक्षण करने के लिए उत्साहित एवं जानकारी प्रदान करना हम सब का कर्तव्य है.  इसलिए,  आज पृथ्वी पर प्रसिद्ध कविता के द्वारा आपके समक्ष कुछ विशेष संकेतों को प्रदर्शित किया जा रहा है ताकि आने वाले समाज में पृथ्वी के प्रति स्वच्छता का सम्मान बढ़े.

 आशा करता हूं पृथ्वी पर कविता आपको पसंद आएगा एवं पृथ्वी को स्वच्छ करने हेतु सम्मान और इच्छा भी बढ़ेगा.

धरती पर हिंदी कविताएँ | Poem on Earth in Hindi

Famous poem on Earth in Hindi

ऊँची धरती नीची धरती, नीली, लाल, गुलाबी धरती।
हरे-भरे वृक्षों से सज्जित, मस्ती में लहराती धरती।।

कल -कल नीर बहाती धरती, शीतल पवन चलाती धरती।
कभी जो चढ़े शैल शिखर तो, कभी सिन्धु खा जाती धरती।।

अच्छी -अच्छी फसलें देकर, मानव को हर्षाती धरती।
हीरा, पन्ना, मोती, माणिक, जैसे रतन लुटाती धरती।।

भेद न करती उंच-नीच का, सबका बोझ उठाती धरती।
अंत-काल में हर प्राणी को, अपनी गोद में सुलाती धरती।।

जाती धर्म से ऊपर उठ कर, सबको गले लगाती धरती।
रहे प्रेम से इस धरती पर, हमको सबक सिखाती धरती।।

Author – डॉ. परशुराम शुक्ल

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धरती पर कविता – सुमित्रानंदन पंत

धरती का आँगन इठलाता, शस्य श्यामला भू का यौवन।
अंतरिक्ष का हृदय लुभाता।।

जौ गेहूँ की स्वर्णिम बाली, भू का अंचल वैभवशाली।
इस अंचल से चिर अनादि से, अंतरंग मानव का नाता।।

आओ नए बीज हम बोएं, विगत युगों के बंधन खोएं।
भारत की आत्मा का गौरव, स्वर्ग लोग में भी न समाता।।

भारत जन रे धरती की निधि, न्यौछावर उन पर सहृदय विधि।
दाता वे, सर्वस्व दान कर, उनका अंतर नहीं अघाता।।

किया उन्होंने त्याग तप वरण, जन स्वभाव का स्नेह संचरण
आस्था ईश्वर के प्रति अक्षय, श्रम ही उनका भाग्य विधाता।।

सृजन स्वभाव से हो उर प्रेरित, नव श्री शोभा से उन्मेषित
हम वसुधैव कुटुम्ब ध्येय रख, बनें नये युग के निर्माता।।

Author – सुमित्रानंदन पंत

पृथ्वी पर कविता – सुरेश यादव

हरी -हरी वह घास उगाती है, फसलों को लहलहाती है।
फूलों में भरती रंग।।

पेड़ों को पाल पोस कर ऊंचा करती, पत्ते पत्ते में रहे जिन्दा हरापन
अपनी देह को खाद बनाती है, धरती इसी लिए माँ कहलाती है ।।

पानी से तर हैं सब, नदियाँ, पोखर, झरने और समंदर।
ज्वालामुखी हजारों फिर भी, सोते धरती के अन्दर।।

जैसा सूरज तपता आसमान में, धरती के भीतर भी दहकता है।
गोद में लेकिन सबको साथ सुलाती है, धरती इसी लिए माँ कहलाती है।।

आग पानी को सिखाती साथ रहना, हर बीज सीखता इस तरह उगना।
एक हाथ फसलें उगा कर, सबको खिलाती है।।

दुसरे हाथ सृजन का , सह -अस्तित्व का।।

एकता का – पाठ पढ़ाती है।
धरती…इसी लिए माँ कहलाती है।।

Author – सुरेश यादव

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पृथ्वी पर विशेष कविता – पूजा लूथरा

प्रकृति हमारी बड़ी निराली।
इससे जुड़ी है ये दुनिया हमारी।।

प्रकृति से ही है धरा निराली।
प्रकृति से ही फैली है हरियाली।।

वृक्ष प्रकृति का है शृंगार।
इनको क्यो काट रहा है इंसान।।

नष्ट इसे करके अपने ही पाँव पर।
कुल्हाड़ी क्यो मार रहा है इंसान।।

प्रकृति की गोद मे जन्म लिया है।
फिर इसको क्यो उजाड़ना चाहता है।।

स्वार्थ साधने के बाद मूह फेर लेना।
क्या मानव यही तेरी मानवता है।।

प्रकृति दात्री है जिसने हमे सर्वस्व दिया।
पर मानव उसे दासी क्यो समझता है।।

क्या मानव इतना स्वार्थी है कि।
अपनी माँ को ही उजाड़ना चाहता है।।

Author – पूजा लूथरा

रंग बिरंगी धरती – प्रमोद भंडारी

सुंदर-सुंदर प्यारी-प्यारी, रंग बिरंगी धरती।
पहन चुनरिया रंगो वाली, दुल्हन जैसी लगती ।।

नीला-नीला आसमान है, बादल काले-काले।
लाल, गुलाबी, नीले, पीले, फूल बड़े मतवाले ।।

हरियाली की फ़ैली चादर, सब के मन को हरती।
सुंदर सुंदर प्यारी प्यारी, रंग बिरंगी धरती ।।

काला कौवा, काली कोयल, भालू भी हैं काला।
कूकड़ू-कू करता है मुर्गा, लाल कलंगी वाला ।।

सुबह-सुबह को भूरी चिड़िया, चीं-चीं चीं-चीं करती।
सुंदर-सुंदर प्यारी-प्यारी, रंग बिरंगी धरती ।।

सुंदर-सुंदर प्यारी-प्यारी, रंग बिरंगी धरती।
पहन चुनरिया रंगो वाली, दुल्हन जैसी लगती ।।

Author – प्रमोद भंडारी

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